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मंडल एक पर नज़र

भारतीय रेल: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य



16 अप्रैल,1853 को मुंबई में सार्वजनिक अवकाश था। पूर्वाह्न से ही लोग बोरीबंदर की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ गवर्नर के निजी बैंड से संगीत की मधुर लहरियां माहौल को खुशनुमा बना रही थीं। तीन बजकर तीस मिनट से कुछ पहले ही 400 विशिष्ट लोग ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के 14 डिब्बों वाली गाड़ी में चढ़े जो उस दिन के आकर्षण का मुख्य केंद्र था। चमकदार डिब्बों के आगे एक छोटा फाकलैंड नाम का भाप इंजन लगा था ।

चार बजकर तीस मिनट पर फाकलैंड के ड्राइवर ने इंजन चालू किया, फायरमैन उत्साह से कोयला झोंक रहा था। फाकलैंड ने गहरी साँस ली और भाप के बादल बाहर निकले। गाड़ी ने सीटी दी। उपस्थित लोग आनंद से मुदित हो उठे। अपराहन की उमस भरी गर्मी के बीच इक्कीस तोपों की सलामी दी गई।
फिर से आखिरी सीटी बजी और छुक-छुक करती हुई यह पहली रेलवे ट्रेन नज़ाकत-नफ़ासत के साथ 35 किमी. की दूरी पूरी कर थाणे पहुँची।

1853 के लगभग छ: वर्षो बाद 3 मार्च 1859 को उत्तर भारत की पहली रेलवे लाइन इलाहाबाद और कानपुर के बीच बनाई गई और इसके बाद 1889 में दिल्ली-अंबाला-कालका लाइन बनाई गई। इस छोटी सी शुरूआत से आज भारतीय रेल एकल प्रबंधन के अन्तर्गत विश्व के सबसे बड़े नेटवर्क में परिवर्तित हो गया है। आज भारतीय रेल 7000 स्टेशन, 62,725 रूट किमी और 10,7,360 ट्रैक किमी तक विस्तृत हैं। आज भारतीय रेल प्रति दिन एक सौ दस लाख से ज्यादा यात्री और 10 लाख टन से ज्यादा माल ढोती है ।

                             

प्रशासनिक दृष्टि से भारतीय रेल को 17 क्षेत्रों में बाँटा गया है, जिसके प्रमुख महाप्रबंधक होते है। भारतीय रेल में कुल 64 मंडल हैं, जिसके प्रमुख मंडल रेल प्रबंधक होते हैं। पूर्वोत्तर रेलवे को तीन मंडलों में विभाजित किया गया है - वाराणसी, इज्जतनगर और लखनऊ।


वाराणसी मंडल

 

वाराणसी मंडल मुख्यत: यात्री प्रधान मंडल है एवं इसका गठन 01.05.1969 को हुआ था। 1981 तक यह मंडल मूलत: मीटर गेज मंडल था। इसी वर्ष गोरखपुर-सीवान सेक्शन का आमान परिवर्तन प्रारंभ हुआ था। तत्पश्चात एक-एक कर सभी सेक्शनों का आमान परिवर्तन प्रारंभ हुआ और अब यह मंडल मुख्यत: ब्रॉड गेज मंडल हो गया है। वाराणसी-भटनी 1990 में, वाराणसी-इलाहाबाद सिटी 1993-94 में, औड़िहार-छपरा 1996 में, मऊ-शांहगज 1997 में, गोरखपुर-पनियहवा 1997 में, इंदारा-फेफना 1999 में, औड़िहार-जौनपुर और कप्तानगंज-थावे 2011 में मीटर गेज से ब्रॉड गेज में परिवर्तित हुआ।

 

आज केवल थावे-छपरा कचहरी तथा इदारा-दोहरीघाट को छोड़कर मंडल के सभी सेक्शन ब्राडगेज हो गए हैं। इस मंडल के मुख्य बाडग्रेज मार्ग गोरखपुर-छपरा, भटनी-इलाहाबाद सिटी, छपरा-औड़िहार, मऊ-शाहगंज, गोरखपुर-पनियहवा, इंदारा-फेफना और औड़िहार-जौनपुर हैं।

इस मंडल में मालगाड़ियों के लिए मुख्य मार्ग गोरखपुर-छपरा, वाराणसी-गोरखपुर, वाराणसी- छपरा, गोरखपुर-पनियहवा, और इंदारा-फेफना है। वाराणसी मंडल का कार्य क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के बारह जिलों और पश्चिमी बिहार के तीन जिलों तक फैला है।

 

वाराणसी : एक परिचय

काशी और बनारस के नाम से विख्यात वाराणसी विश्व के प्राचीनतम जीवंत शहरों में एक है। वास्तव में हिंदू मिथकों में वाराणसी का महत्व अकथ्य है। अंग्रेजी के प्रख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन बनारस की पवित्रता और मिथकीय विश्वास से अभिभूत थे। एक बार उन्होंने लिखा-"बनारस इतिहास से प्राचीन है, परंपरा से प्राचीन है, मिथकों से भी प्राचीन है और इतना प्राचीन दिखता है, जैसे इन सभी को एक साथ रख दिया गया हो।" 'वामन पुराण' के अनुसार वरूणा और असि नदियां काल के प्रारंभ में स्वत: ही आद्य पुरूष के शरीर से निकली हैं। इन दोनो नदियों के मध्य की भूमि ही 'वाराणसी' कहलाती है, जो सभी तीर्थयात्रियों के लिए पवित्रतम स्थान है।

'काशी' शब्द की व्‍युत्पत्ति 'कास' शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है चमकना। मिथक यह है कि काशी, शिव और पार्वती द्वारा सृजित मूल-भूमि है, जहाँ वे काल के प्रारंभ में खड़े थे।

वाराणसी हिंदू धर्म का नाभिस्थल है। यह प्राचीन संस्कृति का परंपरागत शहर है। यहाँ से जुड़ी किंवदंतिया इसकी गरिमा में वृद्धि करती हैं और धर्म इसमें पवित्रता बोध पैदा करता है। जाने कब से यहाँ बड़ी संख्या में तीर्थयात्री और साधक आते रहे हैं। वाराणसी में रहने से अपने आप ही आत्म अन्वेषण तथा शरीर एवं आत्मा के शास्वत ऐक्य का अनुभव होता है। यहाँ आने वाला हर यात्री विस्मित रह जाता है ।

सूर्यास्त के समय गंगा के पार सुनहली रश्मियाँ झिलमिलाती हैं। यही रश्मियाँ सुबह भगवान शिव के अलकों को छूती है, गंगा किनारे के मंदिरों-इबादतगाहों को स्पर्श करती है। मंत्रों और ऋचाओं की स्वर लहरियों तथा अगरबत्तियों-धूपबत्तियों की सुगंध से भीने वातावरण में गंगा के किनारे सुनहले जल में डुबकी लगाकर तीर्थ यात्री अनूठे अनुभव का एहसास करता है।

हिंदू विश्वास के अनुसार वाराणसी में मृत्यु को वरण करने वाला व्यक्ति मोक्ष की प्राप्ति करता है तथा जीवन-मृत्यु, जन्म-पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति पा जाता है। भगवान शिव और पार्वती के निवास स्थल वाराणसी का उद्भव अज्ञात है। ऐसा माना जाता है कि वाराणसी में गंगा जीवों के सभी पापों का नाश कर देती हैं। वाराणसी ऐसी भूमि है जहाँ रहना और आत्मान्वेषण करना अनंत सुख का अनुभव है। वाराणसी संगीत, कला, शिल्प और शिक्षा के लिए भी ख्यात है। भारत से बाहर गए आज विश्व के तमाम ख्यातनाम लोगों की शिक्षा वाराणसी के सांस्कृतिक परिवेश में हुई है। सिल्क की बुनाई कला में वाराणसी का कोई सानी नहीं है, जिससे मूल्यवान बनारसी सिल्क की साड़ियों और सिल्क जरी का निर्माण किया जाता है और विश्वभर के संग्रहकर्ताओं के लिए यह अनूठी चीज है ।


      
          

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वाराणसी मंडल एक नजर में

रूट किमी

ब्राड गेज

मीटर गेज

1251.89 किमी.

1108.12 किमी (डबल ट्रैक- 132.09 किमी.)

143.77 किमी.

ट्रेन सेवा

बीजी-134 जोड़ी

एम जी- 10 जोड़ी

औसत यात्री प्रतिदिन

औसत आय प्रति दिन

स्टेशनों की संख्या

01.80 लाख

95.38 लाख

ए श्रेणी - 07, बी श्रेणी - 07, डी श्रेणी - 26,  ई श्रेणी -80, कुल – 140

स्वीकृत कर्मचारी सं

कार्यरत कर्मचारी

14017

11792

 

 

 




Source : पूर्वोत्तर रेलवे CMS Team Last Reviewed on: 25-04-2013  


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